रविवार, 22 अप्रैल 2018

एक कहानी मिली है,इस कहानी को पढ़ कर सोचिये और समझिये।।।
ध्यान से पढ़ें,
किसी गाँव में चार मित्र रहते थे।
चारों में इतनी घनी मित्रता थी कि हर समय साथ रहते उठते बैठते, योजनाएँ बनाते।
एक ब्राह्मण
एक ठाकुर
एक बनिया और
एक नाई था
पर कभी भी चारों में जाति का भाव नहीं था गज़ब की एकता थी।

इसी एकता के चलते वे गाँव के किसानों के खेत से गन्ने
चने
आदि चीजे उखाड़ कर खाते थे।

एक दिन इन चारों ने किसी किसान के खेत से चने के झाड़ उखाड़े और खेत में ही बैठकर हरी हरी फलियों का स्वाद लेने लगे।

खेत का मालिक किसान आया
चारों की दावत देखी उसे बहुत क्रोध आया
उसका मन किया कि लट्ठ उठाकर चारों को पीटे
पर चार के आगे एक?
वो स्वयं पिट जाता
सो उसने एक युक्ति सोची।

चारों के पास गया,
ब्राह्मण के पाँव छुए,
ठाकुर साहब की जयकार की
बनिया महाजन से राम जुहार और फिर
नाई से बोला--
देख भाई
ब्राह्मण देवता धरती के देव हैं,
ठाकुर साहब तो सबके मालिक हैं अन्नदाता हैं,
महाजन सबको उधारी दिया करते हैं
ये तीनों तो श्रेष्ठ हैं
तो भाई इन तीनों ने चने उखाड़े सो उखाड़े पर तू? तू तो ठहरा नाई तूने चने क्यों उखाड़े?
इतना कहकर उसने नाई के दो तीन लट्ठ रसीद किये।
बाकी तीनों ने कोई विरोध नहीं किया क्योंकि उनकी तो प्रशंसा हो चुकी थी।

अब किसान बनिए के पास आया और बोला-
तू साहूकार होगा तो अपने घर का
पण्डित जी और ठाकुर साहब तो नहीं है ना! तूने चने क्यों उखाड़े?
बनिये के भी दो तीन तगड़े तगड़े लट्ठ जमाए।

पण्डित और ठाकुर ने कुछ नहीं कहा।

अब किसान ने ठाकुर से कहा--
ठाकुर साहब
माना आप अन्नदाता हो पर किसी का अन्न छीनना तो ग़लत बात है
अरे पण्डित महाराज की बात दीगर है
उनके हिस्से जो भी चला जाये दान पुन्य हो जाता है
पर आपने तो बटमारी की! ठाकुर साहब को भी लट्ठ का प्रसाद दिया,

पण्डित जी बोले नहीं,

नाई और बनिया अभी तक अपनी चोट सहला रहे थे।
जब ये तीनों पिट चुके
तब किसान पण्डितजी के पास गया और बोला--
माना आप भूदेव हैं
पर इन तीनों के गुरु घण्टाल आप ही हैं
आपको छोड़ दूँ
ये तो अन्याय होगा
तो दो लट्ठ आपके भी पड़ने चाहिए।
मार खा चुके बाकी तीनों बोले
हाँ हाँ, पण्डित जी को भी दण्ड मिलना चाहिए।
अब क्या पण्डित जी भी पीटे गए।

किसान ने इस तरह चारों को अलग अलग करके पीटा
किसी ने किसी के पक्ष में कुछ नहीं कहा,
उसके बाद से चारों कभी भी एक साथ नहीं देखे गये।

मित्रों पिछली दो तीन सदियों से हिंदुओं के साथ यही होता आया है,
कहानी सच्ची लगी हो तो समझने का प्रयास करो और
अगर कहानी केवल कहानी लगी हो
तो आने वाले समय के लट्ठ तैयार हैं। 🌹

मंगलवार, 17 अप्रैल 2018

*। ज्ञान की बात ।* *घर का मुखिया* बनना आसान नहीं.... उसकी हालत टीन के उस शैड जैसी होती है जो बारीश, तूफान, ओलावृष्टि सब झेलता है, लेकिन उसके नीचे रहने वाले अकसर कहते हैं कि यह आवाज़ बहुत करता है, और गरम भी जल्दी होता है ....! 🙏🙏

अक्षय तृतीया का महत्व, पूजा का मुहूर्त और पूजन विधिI
अक्षय तृतीया को आखातीज भी कहा जाता है। शास्त्रों के मुताबिक इस दिन से सतयुग और त्रेतायुग का आरम्भ माना जाता है। इस दिन किया हुआ तप, दान अक्षय फलदायक होता है। इसलिए इसे अक्षय तृतीया कहते हैं। यदि यह व्रत सोमवार तथा रोहिणी नक्षत्र में पड़ता है तो महा फलदायक माना जाता है। इस दिन प्रातः काल पंखा, चावल, नमक, घी, चीनी, सब्जी, फल, इमली, वस्त्र के दान का बहुत महत्व माना जाता है।

कैसे करें पूजा

अक्षय तृतीया के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर गंगा स्नान करने के बाद भगवान विष्णु की शांत चित्त होकर विधि विधान से पूजा करने का प्रावधान है। नैवेद्य में जौ या गेहूँ का सत्तू, ककड़ी और चने की दाल अर्पित की जाती है। इसके बाद फल, फूल, बरतन तथा वस्त्र आदि ब्राह्मणों को दान के रूप में दिये जाते हैं। इस दिन ब्राह्मण को भोजन करवाना कल्याणकारी समझा जाता है। इस दिन लक्ष्मी नारायण की पूजा सफेद कमल अथवा सफेद गुलाब या पीले गुलाब से करना चाहिये।

पूजा का मुहूर्त

अक्षय तृतीया पर इस वर्ष पूजा का सर्वश्रेष्ठ समय सुबह 6 बजकर 7 मिनट से लेकर दोपहर 12 बजकर 26 मिनट तक है। इसके अलावा यदि आप सोना खरीदना चाह रहे हैं तो 18 अप्रैल को दोपहर तीन बजकर 45 मिनट से लेकर 19 अप्रैल 2018 के दोपहर 1 बजकर 29 मिनट तक खरीद सकते हैं।

भगवान देते हैं दर्शन

इस दिन श्री बद्रीनारायण जी के पट खुलते हैं। वृंदावन स्थित श्री बांके बिहारी जी मन्दिर में भी केवल इसी दिन श्री विग्रह के चरण दर्शन होते हैं, अन्यथा वे पूरे वर्ष वस्त्रों से ढके रहते हैं। इस दिन ठाकुर द्वारे जाकर या बद्रीनारायण जी का चित्र सिंहासन पर रखकर उन्हें भीगी हुई चने की दाल और मिश्री का भोग लगाते हैं। कहते हैं भगवान परशुराम जी का अवतरण भी इसी दिन हुआ था।

दान प्रधान है यह पर्व

यह पर्व दान प्रधान माना गया है। इसी दिन महाभारत का युद्ध समाप्त हुआ था और द्वापर युग का समापन भी इसी दिन हुआ था। इस दिन सत्तू अवश्य खाना चाहिए तथा नए वस्त्र और आभूषण पहनने चाहिए। अक्षय तृतीया के दिन गौ, भूमि, स्वर्ण पात्र इत्यादि का दान बेहद पुण्यदायी माना गया है। पंचांग के मुताबिक यह तिथि वसंत ऋतु के अंत और ग्रीष्म ऋतु का प्रारंभ का दिन भी है।

कर सकते हैं कोई भी मांगलिक कार्य

इस पर्व के महत्व का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस दिन बिना कोई पंचांग देखे कोई भी शुभ व मांगलिक कार्य जैसे विवाह, गृह−प्रवेश, वस्त्र−आभूषणों की खरीददारी या घर, वाहन आदि की खरीददारी आदि कार्य किये जा सकते हैं। पुराणों में इस बात का उल्लेख मिलता है कि इस दिन अपने पितरों को किया गया तर्पण भी अक्षय फल प्रदान करता है। लोग इस दिन गंगा स्नान करते हैं क्योंकि मान्यता है कि इससे तथा भगवत पूजन से उनके समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। पुरानी मान्यता यह भी है कि इस दिन यदि अपनी गलतियों के लिए भगवान से क्षमा मांगी जाए तो वह माफ कर देते हैं।

खूब खरीदें सोना

यह माना जाता है कि इस दिन ख़रीदा गया सोना कभी समाप्त नहीं होता, क्योंकि भगवान विष्णु एवं माता लक्ष्मी स्वयं उसकी रक्षा करते हैं। हिन्दू धर्म की मान्यताओं के अनुसार यह दिन सौभाग्य और सफलता का सूचक है।

कथा− अक्षय तृतीया का महत्व युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण से पूछा था। तब श्रीकृष्ण बोले, 'राजन! यह तिथि परम पुण्यमयी है। इस दिन दोपहर से पूर्व स्नान, जप, तप, होम तथा दान आदि करने वाला महाभाग अक्षय पुण्यफल का भागी होता है। इसी दिन से सतयुग का प्रारम्भ होता है। इस पर्व से जुड़ी एक प्रचलित कथा इस प्रकार है−

प्राचीन काल में सदाचारी तथा देव ब्राह्म्णों में श्रद्धा रखने वाला धर्मदास नामक एक वैश्य था। उसका परिवार बहुत बड़ा था। इसलिए वह सदैव व्याकुल रहता था। उसने किसी से व्रत के माहात्म्य को सुना। कालान्तर में जब यह पर्व आया तो उसने गंगा स्नान किया। विधिपूर्वक देवी देवताओं की पूजा की। गोले के लड्डू, पंखा, जल से भरे घड़े, जौ, गेहूं, नमक, सत्तू, दही, चावल, गुड़, सोना तथा वस्त्र आदि दिव्य वस्तुएं ब्राह्मणों को दान कीं। स्त्री के बार−बार मना करने, कुटुम्बजनों से चिंतित रहने तथा बुढ़ापे के कारण अनेक रोगों से पीड़ित होने पर भी वह अपने धर्म कर्म और दान पुण्य से विमुख न हुआ। यही वैश्य दूसरे जन्म में कुशावती का राजा बना। अक्षय तृतीया के दान के प्रभाव से ही वह बहुत धनी तथा प्रतापी बना। वैभव संपन्न होने पर भी उसकी बुद्धि कभी धर्म से विचलित नहीं हुई।

सोमवार, 16 अप्रैल 2018

.     *🚷आकस्मिक घटना संकेत 🚷*
            *जरूर पढे- और करे भी*

    *"ICE"(In Case of Emergency /आपात स्थिति के समय)*

     *हम सभी अपने मोबाइल की मेमोरी में नाम के साथ नम्बर दर्ज करते हैं किंतु हमारे अलावा कोई नहीं जानता कि इनमें से कौन सा नम्बर हमारे परिवार के सदस्य अथवा नजदीकी रिश्तेदार या मित्र का है।*

    *यदि हम दुर्घटना ग्रस्त हो जाय या अचानक बीमार पड़ जायें तो जो व्यक्ति हमें अस्पताल पहुँचाता है, उसके पास हमारा मोबाइल फोन तो मिल जाता है परंतु वह यह नहीं जानता कि किसे फोन किया जाय ? क्योंकि* *मोबाइल में सैकड़ों नम्बर दर्ज है किंतु आपात स्थिति (Emergency) में किससे सम्पर्क किया जाय?*

     *अतः"ICE"(In Case of Emergency /आपात स्थिति के समय) की परिकल्पना की गई है।*

    *"ICE" की संकल्पना आपात स्थिति (Emergency)में तुरंत सम्पर्क स्थापित करने की विधि है ।जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा मोबाइल फोन रखता है।आपको चाहिए कि आपात स्थिति (Emergency)में जिससे तुरंत सम्पर्क करना चाहिए, उसका फोन नंबर "ICE"(In Case of Emergency) के साथ दर्ज करें।*

    *यह विचार एक पुलिसकर्मी के दिमाग में आया जिसने अनुभव किया कि जब भी वह दुर्घटना स्थल पर पहुंचा, दुर्घटना ग्रस्त अथवा बीमार व्यक्ति के पास मोबाइल फोन तो होता है पर यह पता नहीं चल पाता था कि किससे तुरंत सम्पर्क कर सूचना दी जाय।इस कारण उसने विचार किया कि यदि ऐसी स्थिति हेतु राष्ट्रीय स्तर पर मान्य एक शब्द की संकल्पना की जाय तो आपात कालीन स्थितियों में आपात सेवा देने वाले व्यक्ति या पुलिसकर्मी आपके द्वारा "ICE " के साथ दर्ज किए गए नंबर पर, उचित व्यक्ति से तुरंत सम्पर्क स्थापित करने में सक्षम होंगे।*

    *आज ही अपने मोबाइल फोन में आपात स्थिति में सम्पर्क हेतु "ICE "  के साथ नम्बर दर्ज कर इस विचार धारा को विस्तारित करें।*

*उदाहरणार्थ;*
*नाम : ICE monika*
*नंबर : +91 xxxxx xxxxx*
    *आवश्यक हो तो,  आपात स्थिति हेतु एक से अधिक व्यक्तियों के नाम भी ICE 1, ICE 2, ICE 3 के साथ दर्ज किए जा सकते हैं।*

    *एक उत्तम विचार बहुत बड़ा बदलाव लायेगा।*

    *कृपया इसे अपने प्रियजनों और मित्रों को भेजिए, यह वास्तव में किसी का जीवन बचाने में सहायक सिद्ध होगा।*

    *याद रखिए जब आप बोलने में असमर्थ होंगे," ICE "आपके लिए बोलेगा।*
          

गुरुवार, 12 अप्रैल 2018

*बाबर ने मुश्किल से कोई 4 वर्ष राज किया। हुमायूं को ठोक पीटकर भगा दिया। मुग़ल साम्राज्य की नींव अकबर ने डाली और जहाँगीर, शाहजहाँ से होते हुए औरंगजेब आते आते उखड़ गया।*
*कुल 100 वर्ष (अकबर 1556ई. से औरंगजेब 1658ई. तक) के समय के स्थिर शासन को मुग़ल काल नाम से इतिहास में एक पूरे पार्ट की तरह पढ़ाया जाता है....*
*मानो सृष्टि आरम्भ से आजतक के कालखण्ड में तीन भाग कर बीच के मध्यकाल तक इन्हीं का राज रहा....!*

*अब इस स्थिर (?) शासन की तीन चार पीढ़ी के लिए कई किताबें, पाठ्यक्रम, सामान्य ज्ञान, प्रतियोगिता परीक्षाओं में प्रश्न, विज्ञापनों में गीत, ....इतना हल्ला मचा रखा है, मानो पूरा मध्ययुग इन्हीं 100 वर्षों के इर्द गिर्द ही है।*

*जबकि उक्त समय में मेवाड़ इनके पास नहीं था। दक्षिण और पूर्व भी एक सपना ही था।*
*अब जरा विचार करें..... क्या भारत में अन्य तीन चार पीढ़ी और शताधिक वर्ष पर्यन्त राज्य करने वाले वंशों को इतना महत्त्व या स्थान मिला है ?*
*अकेला विजयनगर साम्राज्य ही 300 वर्ष तक टिका रहा। हीरे माणिक्य की हम्पी नगर में मण्डियां लगती थीं।महाभारत युद्ध के बाद 1006 वर्ष तक जरासन्ध वंश के 22 राजाओं ने । 5 प्रद्योत वंश के राजाओं ने 138 वर्ष , 10 शैशुनागों ने 360 वर्षों तक , 9 नन्दों ने 100 वर्षों तक , 12 मौर्यों ने 316 वर्ष तक , 10 शुंगों ने 300 वर्ष तक , 4 कण्वों ने 85 वर्षों तक , 33 आंध्रों ने 506 वर्ष तक , 7 गुप्तों ने 245 वर्ष तक राज्य किया ।*
*फिर विक्रमादित्य ने 100 वर्षों तक राज्य किया था । इतने महान् सम्राट होने पर भी भारत के इतिहास में गुमनाम कर दिए गए ।*

*उनका वर्णन करते समय इतिहासकारों को मुँह का कैंसर हो जाता है। सामान्य ज्ञान की किताबों में पन्ने कम पड़ जाते है। पाठ्यक्रम के पृष्ठ सिकुड़ जाते है। कोचिंग वालों की नानी मर जाती है। प्रतियोगी परीक्षकों के हृदय पर हल चल जाते हैं।*
*वामपंथी इतिहासकारों ने नेहरूवाद का मल भक्षण कर, जो उल्टियाँ की उसे ज्ञान समझ चाटने वाले चाटुकारों...!*
*तुम्हे धिक्कार है !!!*

*यह सब कैसे और किस उद्देश्य से किया गया ये अभी तक हम ठीक से समझ नहीं पाए हैं और ना हम समझने का प्रयास कर रहे हैं।*

नोट बदलकर देख लिये,
शहरों के नाम बदलकर देख लिये,
योजनाओं के नाम बदलकर देख लिये,
नेताओं की पोजीशन बदलकर भी देख लिया,
प्रधानमंत्री,राष्ट्रपति भी बदलकर देख लिया,
तो भी विकास वहीं का वहीं रहेगा

एक बार
आरक्षण समाप्त कर के देख लो
विकास की गंगा बह निकलेगी

सरकारे कहती है
बेटी मारोगे तो बहु कहा से लाओगे।
सही बात है
लेकिन सरकारे ये क्यों नहीं सोचती  कि
प्रतिभा मारोगे तो  प्रगति कहाँ से लाओगे..???

बुधवार, 4 अप्रैल 2018

*केवट का राम प्रेम भी काली सूची में अंकित कर डाला!*
*शबरी के झूठे बेरों को कैसे आज कलंकित कर डाला!*
*निषाद राज ने ये पीड़ा कहो किससे जाकर कही होगी!*
*वाल्मीकि की आंखों से आज फिर अश्रु धार बही होगी!*
*पीपा देव जी शंकर देव जी किससे दुख बटा रहे होंगे!*
*बाबा साहब आज निश्चित पीड़ा से छटपटा रहे होंगे!*
*कबीर दास के दोहे कोने में हो शर्मसार बैठे होंगे!*
*हनुमत के अपमान पर रैदास भी हो तार तार बैठे होंगे!*
*मीठे बेर चुनने वालों ने कैसे सब हाला कर डाला!*
*हनुमत का कर अपमान भक्ति का पन्ना काला कर डाला!*
*तुम शोषित नही हो पुराणों में सम्मान तुम्हारा भी है!*
*केवल आरक्षण पर लड़ बैठे ये हिंदुस्तान तुम्हारा भी है!*