बुधवार, 9 सितंबर 2020
ये कहानी आपको झकझोर देगी 2 मिनट में एक अच्छी सीख अवश्य पढ़ें....एक बार एक हंस और हंसिनी हरिद्वार के सुरम्य वातावरण से भटकते हुए, उजड़े वीरान और रेगिस्तान के इलाके में आ गये!हंसिनी ने हंस को कहा कि ये किस उजड़े इलाके में आ गये हैं ?? यहाँ न तो जल है, न जंगल और न ही ठंडी हवाएं हैं यहाँ तो हमारा जीना मुश्किल हो जायेगा !भटकते-भटकते शाम हो गयी तो हंस ने हंसिनी से कहा कि किसी तरह आज की रात बीता लो, सुबह हम लोग हरिद्वार लौट चलेंगे !रात हुई तो जिस पेड़ के नीचे हंस और हंसिनी रुके थे, उस पर एक उल्लू बैठा था।वह जोर से चिल्लाने लगा।हंसिनी ने हंस से कहा- अरे यहाँ तो रात में सो भी नहीं सकते।ये उल्लू चिल्ला रहा है। हंस ने फिर हंसिनी को समझाया कि किसी तरह रात काट लो, मुझे अब समझ में आ गया है कि ये इलाका वीरान क्यूँ है ??ऐसे उल्लू जिस इलाके में रहेंगे वो तो वीरान और उजड़ा रहेगा ही।पेड़ पर बैठा उल्लू दोनों की बातें सुन रहा था।सुबह हुई, उल्लू नीचे आया और उसने कहा कि हंस भाई, मेरी वजह से आपको रात में तकलीफ हुई, मुझे माफ़ करदो।हंस ने कहा- कोई बात नही भैया, आपका धन्यवाद! यह कहकर जैसे ही हंस अपनी हंसिनी को लेकर आगे बढ़ा पीछे से उल्लू चिल्लाया, अरे हंस मेरी पत्नी को लेकर कहाँ जा रहे हो।हंस चौंका- उसने कहा, आपकी पत्नी ??अरे भाई, यह हंसिनी है, मेरी पत्नी है,मेरे साथ आई थी, मेरे साथ जा रही है!उल्लू ने कहा- खामोश रहो, ये मेरी पत्नी है।दोनों के बीच विवाद बढ़ गया। पूरे इलाके के लोग एकत्र हो गये। कई गावों की जनता बैठी। पंचायत बुलाई गयी। पंचलोग भी आ गये!बोले- भाई किस बात का विवाद है ??लोगों ने बताया कि उल्लू कह रहा है कि हंसिनी उसकी पत्नी है और हंस कह रहा है कि हंसिनी उसकी पत्नी है!लम्बी बैठक और पंचायत के बाद पंच लोग किनारे हो गये और कहा कि भाई बात तो यह सही है कि हंसिनी हंस की ही पत्नी है, लेकिन ये हंस और हंसिनी तो अभी थोड़ी देर में इस गाँव से चले जायेंगे।हमारे बीच में तो उल्लू को ही रहना है। इसलिए फैसला उल्लू के ही हक़ में ही सुनाना चाहिए! फिर पंचों ने अपना फैसला सुनाया और कहा कि सारे तथ्यों और सबूतों की जाँच करने के बाद यह पंचायत इस नतीजे पर पहुंची है कि हंसिनी उल्लू की ही पत्नी है और हंस को तत्काल गाँव छोड़ने का हुक्म दिया जाता है!यह सुनते ही हंस हैरान हो गया और रोने, चीखने और चिल्लाने लगा कि पंचायत ने गलत फैसला सुनाया। उल्लू ने मेरी पत्नी ले ली!रोते- चीखते जब वह आगे बढ़ने लगा तो उल्लू ने आवाज लगाई - ऐ मित्र हंस, रुको!हंस ने रोते हुए कहा कि भैया, अब क्या करोगे ?? पत्नी तो तुमने ले ही ली, अब जान भी लोगे ?उल्लू ने कहा- नहीं मित्र, ये हंसिनी आपकी पत्नी थी, है और रहेगी! लेकिन कल रात जब मैं चिल्ला रहा था तो आपने अपनी पत्नी से कहा था कि यह इलाका उजड़ा और वीरान इसलिए है क्योंकि यहाँ उल्लू रहता है! मित्र, ये इलाका उजड़ा और वीरान इसलिए नहीं है कि यहाँ उल्लू रहता है।यह इलाका उजड़ा और वीरान इसलिए है क्योंकि यहाँ पर ऐसे पंच रहते हैं जो उल्लुओं के हक़ में फैसला सुनाते हैं!शायद इतने साल की आजादी के बाद भी हमारे देश की दुर्दशा का मूल कारण यही है कि हमने उम्मीदवार की योग्यता व गुण आदि न देखते हुए, हमेशा , ये हमारी बिरादरी का है, ये हमारी पार्टी का है, ये हमारे एरिया का है, के आधार पर हमेशा अपना फैसला उल्लुओं के ही पक्ष में सुनाया है, देश क़ी बदहाली और दुर्दशा के लिए कहीं न कहीं हम भी जिम्मेदार हैं
🌞ये कहानी आपके जीने की सोच बदल देगी!एक दिन एक किसान का बैल कुएँ में गिर गया। वह बैल घंटों ज़ोर -ज़ोर से रोता रहा और किसान सुनता रहा और विचार करता रहा कि उसे क्या करना चाहिऐ और क्या नहीं।अंततः उसने निर्णय लिया कि चूंकि बैल काफी बूढा हो चूका था अतः उसे बचाने से कोई लाभ होने वाला नहीं था और इसलिए उसे कुएँ में ही दफना देना चाहिऐ।। किसान ने अपने सभी पड़ोसियों को मदद के लिए बुलाया सभी ने एक-एक फावड़ा पकड़ा और कुएँ में मिट्टी डालनी शुरू कर दी।जैसे ही बैल कि समझ में आया कि यह क्या हो रहा है वह और ज़ोर-ज़ोर से चीख़ चीख़ कर रोने लगा और फिर ,अचानक वह आश्चर्यजनक रुप से शांत हो गया। सब लोग चुपचाप कुएँ में मिट्टी डालते रहे तभी किसान ने कुएँ में झाँका तो वह आश्चर्य से सन्न रह गया..अपनी पीठ पर पड़ने वाले हर फावड़े की मिट्टी के साथ वह बैल एक आश्चर्यजनक हरकत कर रहा था वह हिल-हिल कर उस मिट्टी को नीचे गिरा देता था और फिर एक कदम बढ़ाकर उस पर चढ़ जाता था। जैसे-जैसे किसान तथा उसके पड़ोसी उस पर फावड़ों से मिट्टी गिराते वैसे -वैसे वह हिल-हिल कर उस मिट्टी को गिरा देता और एक सीढी ऊपर चढ़ आता जल्दी ही सबको आश्चर्यचकित करते हुए वह बैल कुएँ के किनारे पर पहुंच गया और फिर कूदकर बाहर भाग गया । ध्यान रखे आपके जीवन में भी बहुत तरह से मिट्टी फेंकी जायेगी बहुत तरह की गंदगी आप पर गिरेगी जैसे कि , आपको आगे बढ़ने से रोकने के लिए कोई बेकार में ही आपकी आलोचना करेगा कोई आपकी सफलता से ईर्ष्या के कारण आपको बेकार में ही भला बुरा कहेगा कोई आपसे आगे निकलने के लिए ऐसे रास्ते अपनाता हुआ दिखेगा जो आपके आदर्शों के विरुद्ध होंगे... ऐसे में आपको हतोत्साहित हो कर कुएँ में ही नहीं पड़े रहना है बल्कि साहस के साथ हर तरह की गंदगी को गिरा देना है और उससे सीख ले कर उसे सीढ़ी बनाकर बिना अपने आदर्शों का त्याग किये अपने कदमों को आगे बढ़ाते जाना है। सकारात्मक रहे.. सकारात्मक जिए!इस संसार में.... सबसे बड़ी सम्पत्ति "बुद्धि " सबसे अच्छा हथियार "धैर्य" सबसे अच्छी सुरक्षा "विश्वास" सबसे बढ़िया दवा "हँसी" हैऔर आश्चर्य की बात कि "ये सब निशुल्क हैं।
सोमवार, 7 सितंबर 2020
My dear Public,. ● कोरोना केस, टेस्ट ज़्यादा होने से नहीं बढ़ रहे।केस इसलिये बढ़ रहे हैं कि 6 महीने बाद भी आपको ये समझ नहीं आया कि मास्क नाक के ऊपर रखना है और दूसरों से दूरी बना कर रखनी है।● आप चकित हैं कि आपके दादाजी को कोरोना कैसे हो गया, जब कि वो तो 6 महीने से घर से बाहर ही नहीं निकले! तो आपको लाउड स्पीकर से सूचित हो कि उन्हें कोरोना आपके घर के उस मेंबर की वज़ह से हुआ जो बाहर निकला और जिसने बचाव के सिंपल नियमों का पालन नहीं किया, और फ़िर अपने साथ कोरोना को घर ले कर आया। वो तो बच गया, लेकिन उसने घर के बुज़ुर्ग का बैंड बजा दिया।● आप गुस्से में हैं कि प्राइवेट हॉस्पिटल ने आपको लूट लिया। आपके टेस्ट की ग़लत रिपोर्ट दे दी। तो मेरी विनती है कि सबसे पहले गुस्सा ख़ुद पर करें कि आप प्राइवेट हॉस्पिटल गए किसलिये? आपकी तबियत ख़राब हुई क्यों? आपको कोरोना हुआ कैसे? क्या आपने मास्क ढंग से नहीं पहना? क्या आप दूसरों से चिपके? क्या आपने हाथ ठीक से साफ़ नहीं किये? अग़र आपने कोई कोताही नहीं बरती, तो आपको कोरोना हो ही नहीं सकता, ये बात बिना भावुक हुए मान लीजिये।● प्राइवेट हॉस्पिटल्स में मरीजों की संख्या इस कोरोना काल में आधे से भी कम हो गई है। प्राइवेट अस्पतालों को सरकार कोई सब्सिडी नहीं देती, उल्टा कमर्शियल रेट चार्ज करती है। जिन हॉस्पिटल पर आप लूट के आरोप लगा रहे हैं वो अपने कर्मचारियों की सैलेरी काट रहे हैं। मरीज़ कम होने और ख़र्चे बढ़ने पर पैसा कहां से आएगा श्रीमान...??? हॉस्पिटल का सिक्योरिटी गार्ड, अकाउंटेंट, हाउस कीपिंग स्टाफ आपका इलाज़ नहीं करता। आप जितने कम दामों में अच्छे से अच्छा इलाज़ चाहते हैं, उन दामों में इन सबकी सैलेरी कैसे निकलेगी जजमान??● आपने तो कोरोना से बचने में घनघोर लापरवाही की, लेकिन आप ये चाहते हैं कि आपका इलाज़ करने वाला डॉक्टर, नर्स बिना ख़ुद की जान की परवाह किये, आपके बिल्कुल नज़दीक आ कर आपको पूरा चैक करे, दिन में चार बार आपको देखने आए, आपकी पल पल की मॉनिटरिंग करे, और फ़िर पैसे भी कम ले!! बड़े सयाने हैं आप !!!● इस झगड़े को ख़त्म करने का एक ही उपाय है कि आप डॉक्टरों और अस्पतालों पर तान तोड़ना छोड़ें, कोरोना से बचने के सरल नियमों का समझ और ईमानदारी से पालन करें। ना होगा कोरोना, और ना लूटेंगे डॉक्टर। विश्वास कीजिये, आपको कोरोना नहीं होगा, तो डॉक्टरों को आपसे भी ज़्यादा ख़ुशी होगी, कि आपकी तो बची ही, साथ में उनकी भी जान बची...! और अग़र ऐसा नहीं करना है, तो लादें कोरोना को अपने सिर, फ़िर प्राइवेट अस्पताल की ओर मुंह करके, बिना वहां पधारे, दूर से ही उसे गाली दे लें, और फ़िर किसी सरकारी अस्पताल की तरफ़ अपनी गाड़ी मोड़ लें...ईश्वर आपको नियमों को समझने लायक बुद्धि दे और आपको सदा स्वस्थ रखे...
*दोस्त अब थकने लगे है*किसीका *पेट* निकल आया है,किसीके *बाल* पकने लगे है...सब पर भारी *ज़िम्मेदारी* है,सबको छोटी मोटी कोई *बीमारी* है।दिनभर जो *भागते दौड़ते* थे,वो अब चलते चलते भी *रुकने* लगे है।पर ये हकीकत है,सब दोस्त *थकने* लगे है...1किसी को *लोन* की फ़िक्र है,कहीं *हेल्थ टेस्ट* का ज़िक्र है।फुर्सत की सब को कमी है,आँखों में अजीब सी नमीं है।कल जो प्यार के *ख़त लिखते* थे,आज *बीमे के फार्म* भरने में लगे है।पर ये हकीकत है सब दोस्त थकने लगे है....2देख कर *पुरानी तस्वीरें*,आज जी भर आता है।क्या अजीब शै है ये वक़्त भी,किस तरहा ये गुज़र जाता है।कल का *जवान* दोस्त मेरा,आज *अधेड़* नज़र आता है...*ख़्वाब सजाते* थे जो कभी ,आज *गुज़रे दिनों में खोने* लगे है।पर ये हकीकत है सब दोस्त थकने लगे है...
शुक्रवार, 4 सितंबर 2020
*एक दोस्त हलवाई की दुकान पर मिल गया ।* मुझसे कहा- ‘आज माँ का श्राद्ध है, माँ को लड्डू बहुत पसन्द है, इसलिए लड्डू लेने आया हूँ ' मैं आश्चर्य में पड़ गया । अभी पाँच मिनिट पहले तो मैं उसकी माँ से सब्जी मंडी में मिला था । मैं कुछ और कहता उससे पहले ही खुद उसकी माँ हाथ में झोला लिए वहाँ आ पहुँची । मैंने दोस्त की पीठ पर मारते हुए कहा- 'भले आदमी ये क्या मजाक है ? माँजी तो यह रही तेरे पास ! दोस्त अपनी माँ के दोनों कंधों पर हाथ रखकर हँसकर बोला, 'भई, बात यूँ है कि मृत्यु के बाद गाय-कौवे की थाली में लड्डू रखने से अच्छा है कि माँ की थाली में लड्डू परोसकर उसे जीते-जी तृप्त करूँ । मैं मानता हूँ कि जीते जी माता-पिता को हर हाल में खुश रखना ही सच्चा श्राद्ध है । आगे उसने कहा, 'माँ को मिठाई, सफेद जामुन, आम आदि पसंद है मैं वह सब उन्हें खिलाता हूँ । श्रद्धालु मंदिर में जाकर अगरबत्ती जलाते हैं । मैं मंदिर नहीं जाता हूँ, पर माँ के सोने के कमरे में कछुआ छाप अगरबत्ती लगा देता हूँ सुबह जब माँ गीता पढ़ने बैठती है तो माँ का चश्मा साफ कर के देता हूँ । मुझे लगता है कि ईश्वर के फोटो व मूर्ति आदि साफ करने से ज्यादा पुण्य माँ का चश्मा साफ करके मिलता है यह बात श्रद्धालुओं को चुभ सकती है पर बात खरी है । हम बुजुर्गों के मरने के बाद उनका श्राद्ध करते हैं । पंडितों को खीर-पुरी खिलाते हैं । रस्मों के चलते हम यह सब कर लेते है, पर याद रखिए कि गाय-कौए को खिलाया ऊपर पहुँचता है या नहीं, यह किसे पता । अमेरिका या जापान में भी अभी तक स्वर्ग के लिए कोई टिफिन सेवा शुरू नही हुई है । *माता-पिता को जीते-जी ही सारे सुख देना वास्तविक श्राद्ध है ॥*
गुरुवार, 3 सितंबर 2020
*भगवान कहाँ है....?*मैं कईं दिनों से बेरोजगार था , एक एक रूपये की कीमत जैसे करोड़ों लग रही थी , इस उठापटक में था कि कहीं नौकरी लग जाए। आज एक इंटरव्यू था , पर दूसरे शहर जाने के लिए जेब में सिर्फ दस रूपये थे . मुझे कम से कम दो सौ रुपयों की जरूरत थी। अपने इकलौते इन्टरव्यू वाले कपड़े रात में धो, पड़ोसी की प्रेस माँग के तैयार कर पहन, अपने योग्यताओं की मोटी फाइल बगल में दबाकर दो बिस्कुट खा के निकला। लिफ्ट ले पैदल जैसे तैसे चिलचिलाती धूप में तरबतर बस इस उम्मीद में स्टेंड पर पहुँचा कि शायद कोई पहचान वाला मिल जाए , जिससे सहायता लेकर इन्टरव्यू के स्थान तक पहुँच सकूँ।काफी देर खड़े रहने के बाद भी कोई नहीं दिखा। मन में घबराहट और मायूसी थी , क्या करूँगा अब कैसे पँहुचूगा ? पास के मंदिर पर जा पहुंचा , दर्शन कर सीढ़ियों पर बैठा था। मेरे पास में ही एक फकीर बैठा था , उसके कटोरे में मेरी जेब और बैंक एकाउंट से भी ज्यादा पैसे पड़े थे।मेरी नजरें और हालात समझ के बोला , "कुछ मदद चाहिए क्या ?" मैं बनावटी मुस्कुराहट के साथ बोला , "आप क्या मदद करोगे ?"*"चाहो तो मेरे पूरे पैसे रख लो ." वो मुस्कुराता बोला . मैं चौंक गया ! उसे कैसे पता मेरी जरूरत?मैनें कहा "क्यों"?"शायद आपको जरूरत है" वो गंभीरता से बोला। "हाँ है तो , पर तुम्हारा क्या , तुम तो दिन भर माँग के कमाते हो ?" मैने उस का पक्ष रखते हुए कहा .*वो हँसता हुआ बोला , "मैं नहीं माँगता साहब ! लोग डाल जाते हैं मेरे कटोरे में, पुण्य कमाने के लिए। मैं तो फकीर हूँ , मुझे इनका कोई मोह नहीं . मुझे सिर्फ भूख लगती है , वो भी एक टाइम . और कुछ दवाइयाँ . बस! मैं तो खुद ये सारे पैसे मंदिर की पेटी में डाल देता हूँ ." वो सहज था कहते कहते। मैनें हैरानी से पूछा , "फिर यहाँ बैठते क्यों हो..?" "जरूरतमंदों की मदद करने" कहते हुए वो मंद मंद मुस्कुरा रहा था।मैं उसका मुँह देखता रह गया। उसने दो सौ रुपये मेरे हाथ पर रख दिए और बोला , "जब हो तब लौटा देना।" मैं उसका शुक्रिया जताता हुआ वहाँ से अपने गंतव्य तक पँहुचा . मेरा इंटरव्यू हुआ , और सलेक्शन भी। मैं खुशी खुशी वापस आया, सोचा उस फकीर को धन्यवाद दे दूँ।मैं मंदिर पँहुचा , बाहर सीढ़़ियों पर भीड़ लगी थी , मैं घुस के अंदर पँहुचा , देखा वही फकीर मरा पड़ा था। मैं भौंचक्का रह गया ! मैने दूसरों से पूछा यह कैसे हुआ ?पता चला , वो किसी बीमारी से परेशान था . सिर्फ दवाईयों पर जिन्दा था . आज उसके पास दवाइयाँ नहीं थी और न उन्हें खरीदने के पैसे। मैं अवाक् सा उस फकीर को देख रहा था। अपनी दवाईयों के पैसे वो मुझे दे गया था जिन पैसों पे उसकी जिंदगी का दारोमदार था। उन पैसों से मेरी ज़िंदगी बना दी थी। भीड़ में से कोई बोला , अच्छा हुआ मर गया ये भिखारी भी साले बोझ होते हैं , कोई काम के नहीं।मेरी आँखें डबडबा आयी!*वो भिखारी कहाँ था , वो तो मेरे** लिए भगवान ही था।नेकी का फरिश्ता। मेरा भगवान! *भगवान कौन हैं ? कहाँ हैं ?* *किसने देखा है ? बस ! इसी* *तरह मिल जाते हैं।**हे! मेरे प्रभु आपको कोटी कोटी प्रणाम* ✨🌷🙏🌷
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