सोमवार, 10 अप्रैल 2017

Mera jiwan


*खवाहिश  नही  मुझे  मशहूर  होने  की*।
*आप  मुझे  पहचानते  हो  बस  इतना  ही  काफी  है*।

*अच्छे  ने  अच्छा  और  बुरे  ने  बुरा  जाना  मुझे*।
*क्यों  कि  जिसकी  जितनी  जरुरत  थी  उसने  उतना  ही  पहचाना  मुझे*।

*ज़िन्दगी  का  फ़लसफ़ा  भी   कितना  अजीब  है*,
*शामें  कटती  नहीं,  और  साल  गुज़रते  चले  जा  रहे  हैं*....!!

*एक  अजीब  सी  दौड़  है  ये  ज़िन्दगी*,
*जीत  जाओ  तो  कई  अपने  पीछे  छूट  जाते  हैं*,
*और  हार  जाओ  तो  अपने  ही  पीछे  छोड़  जाते  हैं*।

*बैठ जाता हूं मिट्टी पे अक्सर*...
*क्योंकि मुझे अपनी औकात अच्छी लगती है*..

*मैंने समंदर से सीखा है जीने का सलीक़ा*,
*चुपचाप से बहना और अपनी मौज में रहना*।।

*ऐसा नहीं है कि मुझमें कोई ऐब नहीं है*
*पर सच कहता हूँ मुझमे कोई फरेब नहीं है*

*जल जाते हैं मेरे अंदाज़ से मेरे दुश्मन क्यूंकि एक मुद्दत से मैंने*
*न औकात बदली और न दोस्त बदले* .!!.

*एक घड़ी ख़रीदकर हाथ मे क्या बाँध ली*..
*वक़्त पीछे ही पड़ गया मेरे*..!!

*सोचा था घर बना कर बैठुंगा सुकून से*..
*पर घर की ज़रूरतों ने मुसाफ़िर बना डाला* !!!

*सुकून की बात मत कर ऐ दुनिया
*बचपन वाला 'इतवार' अब नहीं आता*

*जीवन की भाग-दौड़ में*
*क्यूँ वक़्त के साथ रंगत खो जाती है* ?
*हँसती-खेलती ज़िन्दगी भी आम हो जाती है*..

*एक सवेरा था जब हँस कर उठते थे हम और*
*आज कई बार बिना मुस्कुराये ही शाम हो जाती है*..

*कितने दूर निकल गए*,
*रिश्तो को निभाते निभाते*..
*खुद को खो दिया हमने, अपनों को पाते पाते*..

*लोग कहते है हम मुस्कुराते बहोत है*,
*और हम थक गए दर्द छुपाते छुपाते*..

*खुश* *हूँ और* *सबको खुश* *रखता हूँ*,
*लापरवाह* *हूँ फिर भी सबकी परवाह*
*करता हूँ*..

*मालूम है कोई मोल नहीं मेरा, फिर भी*,
*कुछ अनमोल लोगो से रिश्ता रखता हूँ*...!

रविवार, 9 अप्रैल 2017

Dr. Jhola Chap

झोलाछाप : दर्द या दवा - आजादी के इतने वर्षों बाद भी गाँवो में स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली के लिये इन झोलाछापों को नहीं बल्कि सरकार को हाइकोर्ट द्वारा कटघरे में खड़ा करना चाहिये, जो खुद के गुनाहों का ठीकरा इन झोलाछाप डा. के सर फोड़ने के लिये बढ़ चढ़ के छापे मार रहे हैं। जब 2 बजे रात को दूर गांव में या शहर की गरीब बस्ती में  बूढी माँ या दुधपीता बच्चा तेज बुखार से तप रहा होता है। तो यही झोलाछाप डॉक्टर साहब एक फोन या घर खटखटाने पर देवदूत की तरह प्रकट होते हैं। कोई भी सरकारी डॉ इस आपात समय में फोन उठाना तो दूर क्लिनिक का दरवाजा भी नहीं खोलते।तो इन्हीं झोँलाछाप के पास जाते है उतने ही समय ईलाज करवा कर हम कष्ट मुक्त होते आये है।गँभीर चिँतन का विषय यह है कि
  इनकी उत्पत्ति का जिम्मेदार कौन है? क्या ग्रामीण क्षेत्रों और गरीब शहरी बस्तियों में छोटी मोटी बिमारियों हेतु आपात कालीन स्थितियों में शासन के पास कोई सटीक, सुव्यवस्थित तंत्र उपलब्ध है? यदि हाँ तो जनता क्यों इन झोलाछाप चिकित्सको के पास अपना ईलाज कराने जाती है?जाहीर सी बात हर परीस्थिती इनकी समर्पित भाव।जो हमेँ सरकार द्वारा नहीँ मीलती। इस स्थिति का वास्तविक जिम्मेदार कौन है? पहले सुविधा देना सुनिश्चित करो फिर सुविधा छिनने का कदम उठाओ तो न्यायोचित होगा। व्यवश्थापन पहले फीर इनपर कारवाही हो .अगर आप हर गाँव मेँ एक एक MBBS. डा. नहीँ भेज देते जब तक ये झोलाछाप डा. सेवा देते रहेँगे.गाँव हमारा कष्ट हमारा जिसे निवारन करने की जिम्
मेदारी सरकार की है।जो नही होपारहा है।तो विवष होकर हमे ईन झोलाछाप डा. की मदद लेनी पडती है।जिसे ये बखूबी निभाते आ रहे है।जिनपर हमे विश्वास  है।क्यो ना ईन्हे ही प्रशि
क्षण दे कर हमारे सेवा के लिये नियुक्ति का कोइ ठोस कदम उठाये ताकी उनके इतने सालों सेवा का कोई सटीक उपहार इन्हे मिले जो इनका हक  है।

Dr. Jhola chap

झोलाछाप : दर्द या दवा - आजादी के इतने वर्षों बाद भी गाँवो में स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली के लिये इन झोलाछापों को नहीं बल्कि सरकार को हाइकोर्ट द्वारा कटघरे में खड़ा करना चाहिये, जो खुद के गुनाहों का ठीकरा इन झोलाछाप डा. के सर फोड़ने के लिये बढ़ चढ़ के छापे मार रहे हैं। जब 2 बजे रात को दूर गांव में या शहर की गरीब बस्ती में  बूढी माँ या दुधपीता बच्चा तेज बुखार से तप रहा होता है। तो यही झोलाछाप डॉक्टर साहब एक फोन या घर खटखटाने पर देवदूत की तरह प्रकट होते हैं। कोई भी सरकारी डॉ इस आपात समय में फोन उठाना तो दूर क्लिनिक का दरवाजा भी नहीं खोलते।तो इन्हीं झोँलाछाप के पास जाते है उतने ही समय ईलाज करवा कर हम कष्ट मुक्त होते आये है।गँभीर चिँतन का विषय यह है कि
  इनकी उत्पत्ति का जिम्मेदार कौन है? क्या ग्रामीण क्षेत्रों और गरीब शहरी बस्तियों में छोटी मोटी बिमारियों हेतु आपात कालीन स्थितियों में शासन के पास कोई सटीक, सुव्यवस्थित तंत्र उपलब्ध है? यदि हाँ तो जनता क्यों इन झोलाछाप चिकित्सको के पास अपना ईलाज कराने जाती है?जाहीर सी बात हर परीस्थिती इनकी समर्पित भाव।जो हमेँ सरकार द्वारा नहीँ मीलती। इस स्थिति का वास्तविक जिम्मेदार कौन है? पहले सुविधा देना सुनिश्चित करो फिर सुविधा छिनने का कदम उठाओ तो न्यायोचित होगा। व्यवश्थापन पहले फीर इनपर कारवाही हो .अगर आप हर गाँव मेँ एक एक MBBS. डा. नहीँ भेज देते जब तक ये झोलाछाप डा. सेवा देते रहेँगे.गाँव हमारा कष्ट हमारा जिसे निवारन करने की जिम्
मेदारी सरकार की है।जो नही होपारहा है।तो विवष होकर हमे ईन झोलाछाप डा. की मदद लेनी पडती है।जिसे ये बखूबी निभाते आ रहे है।जिनपर हमे विश्वास  है।क्यो ना ईन्हे ही प्रशि
क्षण दे कर हमारे सेवा के लिये नियुक्ति का कोइ ठोस कदम उठाये ताकी उनके इतने सालों सेवा का कोई सटीक उपहार इन्हे मिले जो इनका हक  है।

🌷🌷

*रोटी पर घी और*
*नाम के साथ "जी"*
*लगाने से*
*स्वाद और इज्जत*
*दोनों बढ़ जाते हैं।*

*किसी को स्नेह देना*
*सबसे बड़ा उपहार है।*
*और*
*किसी का स्नेह पाना*
*सबसे बड़ा सम्मान हैं।*

*तारीफ़ करने वाले बेशक आपको*
*पहचानते होंगे, मगर फ़िक्र करने वालो*
*को आपको ही पहचानना होगा।*

🌷good morning🌷

डॉ. कोमल अग्रवाल

कृपया मैसेज को पढें और अपने दोस्तों को भेजे

ये जानना बहुत जरुरी है.!

हम पानी क्यों ना पीये खाना खाने के बाद.!
क्या कारण है.?
हमने दाल खाई,
हमने सब्जी खाई,
हमने रोटी खाई,
हमने दही खाया,
लस्सी पी, दूध, दही, छाझ, लस्सी, फल आदि.!
ये सब कुछ भोजन के रूप मे हमने ग्रहण किया
ये सब कुछ हमको उर्जा देता है
और पेट उस उर्जा को आगे ट्रांसफर करता है.!
पेट मे एक छोटा सा स्थान होता है
जिसको हम हिंदी मे कहते है "अमाशय"
उसी स्थान का संस्कृत नाम है "जठर"
उसी स्थान को अंग्रेजी मे कहते है
"epigastrium"
ये एक थेली की तरह होता है
और यह जठर
हमारे शरीर मे सबसे
महत्वपूर्ण है
क्योंकि सारा खाना सबसे पहले इसी मे आता है।
ये बहुत छोटा सा स्थान हैं
इसमें अधिक से अधिक 350gms खाना आ सकता है.!
हम कुछ भी खाते
सब ये अमाशय मे आ जाता है.!

आमाशय मे अग्नि प्रदीप्त होती है

उसी को कहते हे "जठराग्न".!
ये जठराग्नि है
वो अमाशय मे प्रदीप्त होने वाली आग है ।
ऐसे ही पेट मे होता है
जेसे ही आपने खाना खाया
की जठराग्नि प्रदीप्त हो गयी..t
यह ऑटोमेटिक है,
जेसे ही अपने रोटी का पहला टुकड़ा मुँह मे डाला
की इधर जठराग्नि प्रदीप्त हो गई.!
ये अग्नि तब तक जलती हे जब तक खाना' पचता है |

अब अपने खाते ही
गटागट पानी पी लिया
और खूब ठंडा पानी पी लिया.r

और कई लोग तो बोतल पे बोतल पी जाते है.!

अब जो आग (जठराग्नि) जल रही थी
वो बुझ गयी.!
आग अगर बुझ गयी
.तो खाने की पचने की जो क्रिया है
वो रुक गयी.!
You suffer from IBS,
Never CURABLE

अब हमेशा याद रखें
खाना जाने पर
हमारे पेट में दो ही क्रिया होती है,
एक क्रिया है
जिसको हम कहते हे
"Digestion"
और दूसरी है "fermentation" फर्मेंटेशन का मतलब है
सडना...!
और
डायजेशन का मतलब हे
पचना.!

आयुर्वेद के हिसाब से आग जलेगी
तो खाना पचेगा,
खाना पचेगा
तो उससे रस बनेगा.!
जो रस बनेगा
तो उसी रस से
मांस, मज्जा, रक्त, वीर्य, हड्डिया, मल, मूत्र और अस्थि बनेगा
और सबसे अंत मे मेद बनेगा.!

ये तभी होगा
जब खाना पचेगा.!

यह सब हमें चाहिए.
ये तो हुई खाना पचने की बात.
अब जब खाना सड़ेगा तब क्या होगा..?

खाने के सड़ने पर
सबसे पहला जहर जो बनता है
वो हे यूरिक एसिड (uric acid)

कई बार आप डॉक्टर के पास जाकर कहते है
की मुझे घुटने मे दर्द हो रहा है,
मुझे कंधे-कमर मे दर्द हो रहा है

तो डॉक्टर कहेगा आपका यूरिक एसिड बढ़ रहा है
आप ये दवा खाओ,
वो दवा खाओ यूरिक एसिड कम करो|
और एक दूसरा उदाहरण खाना

जब खाना सड़ता है,
तो यूरिक एसिड जेसा ही एक दूसरा विष बनता है
जिसको हम कहते हे
LDL (Low Density lipoprotive)
माने खराब कोलेस्ट्रोल (cholesterol)

जब आप
ब्लड प्रेशर(BP) चेक कराने
डॉक्टर के पास जाते हैं
तो वो आपको कहता है (HIGH BP)

हाई-बीपी है
आप पूछोगे...
कारण बताओ.?

तो वो कहेगा
कोलेस्ट्रोल बहुत ज्यादा बढ़ा हुआ है |

आप ज्यादा पूछोगे
की कोलेस्ट्रोल कौनसा बहुत है ?

तो वो आपको कहेगा
LDL बहुत है |

इससे भी ज्यादा
खतरनाक एक  विष हे
वो है.... VLDL
(Very Low Density Lipoprotive)

ये भी कोलेस्ट्रॉल जेसा ही विष है।
अगर VLDL बहुत बढ़ गया
तो आपको भगवान भी नहीं बचा सकता|

खाना सड़ने पर
और जो जहर बनते है
उसमे एक ओर विष है
जिसको अंग्रेजी मे हम कहते है triglycerides.!

जब भी डॉक्टर
आपको कहे
की आपका "triglycerides" बढ़ा हुआ हे
तो समज लीजिए
की आपके शरीर मे
विष निर्माण हो रहा है |

तो कोई यूरिक एसिड के नाम से कहे,
कोई कोलेस्ट्रोल के नाम से कहे,
कोई LDL -VLDL के नाम से कहे
समझ लीजिए
की ये विष हे
और ऐसे विष 103 है |

ये सभी विष
तब बनते है
जब खाना सड़ता है |

मतलब समझ लीजिए
किसी का कोलेस्ट्रोल बढ़ा हुआ है
तो एक ही मिनिट मे ध्यान आना चाहिए
की खाना पच नहीं रहा है ,

कोई कहता हे
मेरा triglycerides बहुत बढ़ा हुआ है
तो एक ही मिनिट मे डायग्नोसिस कर लीजिए आप...!
की आपका खाना पच नहीं रहा है |

कोई कहता है
मेरा यूरिक एसिड बढ़ा हुआ है
तो एक ही मिनिट लगना चाहिए समझने मे
की खाना पच नहीं रहा है |

क्योंकि खाना पचने पर
इनमे से कोई भी जहर नहीं बनता.!

खाना पचने पर
जो बनता है
वो है....
मांस, मज्जा, रक्त, वीर्य, हड्डिया, मल, मूत्र, अस्थि.!

और

खाना नहीं पचने पर बनता है....
यूरिक एसिड,
कोलेस्ट्रोल,
LDL-VLDL.!

और यही
आपके शरीर को
रोगों का घर बनाते है.!

पेट मे बनने वाला यही जहर
जब ज्यादा बढ़कर खून मे आते है !
तो खून दिल की नाड़ियो मे से निकल नहीं पाता
और रोज थोड़ा थोड़ा कचरा
जो खून मे आया है
इकट्ठा होता रहता है
और एक दिन नाड़ी को ब्लॉक कर देता है
जिसे आप
heart attack कहते हैं.!

तो हमें जिंदगी मे ध्यान इस बात पर देना है
की जो हम खा रहे हे
वो शरीर मे ठीक से पचना चाहिए
और खाना ठीक से पचना चाहिए
इसके लिए पेट मे
ठीक से आग (जठराग्नि) प्रदीप्त होनी ही चाहिए|

क्योंकि
बिना आग के खाना पचता नहीं हे
और खाना पकता भी नहीं है

महत्व की बात
खाने को खाना नहीं
खाने को पचाना है |

आपने क्या खाया कितना खाया
वो महत्व नहीं हे.!

खाना अच्छे से पचे
इसके लिए वाग्भट्ट जी ने सूत्र दिया.!

"भोजनान्ते विषं वारी"

(मतलब
खाना खाने के तुरंत बाद
पानी पीना
जहर पीने के बराबर है)

इसलिए खाने के
तुरंत बाद पानी
कभी मत पिये..!

अब आपके मन मे सवाल आएगा
कितनी देर तक नहीं पीना.?

तो 1 घंटे 48 मिनट तक नहीं पीना !

अब आप कहेंगे
इसका
क्या calculation हैं.?

बात ऐसी है....!

जब हम खाना खाते हैं
तो जठराग्नि द्वारा
सब एक दूसरे मे
मिक्स होता है
और फिर खाना पेस्ट मे बदलता हैं.!

पेस्ट मे बदलने की क्रिया होने तक
1 घंटा 48 मिनट का समय लगता है !

उसके बाद जठराग्नि कम हो जाती है.!

(बुझती तो नहीं लेकिन बहुत धीमी हो जाती है)

पेस्ट बनने के बाद
शरीर मे रस बनने की
परिक्रिया शुरू होती है !

तब हमारे शरीर को
पानी की जरूरत होती हैं।

तब आप जितना इच्छा हो
उतना पानी पिये.!

जो बहुत मेहनती लोग है
(खेत मे हल चलाने वाले,
रिक्शा खीचने वाले,
पत्थर तोड़ने वाले)

उनको 1 घंटे के बाद ही
रस बनने लगता है
उनको  घंटे बाद
पानी पीना चाहिए !

अब आप कहेंगे
खाना खाने के पहले
कितने मिनट तक पानी पी सकते हैं.?

तो खाना खाने के
45 मिनट पहले तक
आप पानी पी सकते हैं !

अब आप पूछेंगे
ये मिनट का calculation....?

बात ऐसी ही
जब हम पानी पीते हैं
तो वो शरीर के प्रत्येक अंग तक जाता है !

और अगर बच जाये
तो 45 मिनट बाद मूत्र पिंड तक पहुंचता है.!

तो पानी - पीने से मूत्र पिंड तक आने का समय 45 मिनट का है !

तो आप खाना खाने से
45 मिनट पहले ही
पाने पिये.!

शनिवार, 8 अप्रैल 2017

*One of the Great msg*

```हज़ारों साल से मेरा समाज दूसरों के पाँव छूकर जिंन्दगी जीता आया है| मैं उन्हे इतना क़ाबिल बनाना चाहता हुँ कि वो अपनी जिंन्दगी किसी के सहारे पर नहीं बल्की अपनी मेहनत पर जिये। लेकिन मेरे लोग मेरे पैर छूकर अपनी ज़िम्मेदारी भूलना चाहते है| मेरा जय जयकार करने से आंदोलन आगे बढ़ने वाला नहीं है| मेरी विचारधारा को समझकर कार्य करना चाहिए, यह बात मैं समाज को बताना चाहता हूँ।```
              
  *- डॉ. बाबासाहब आंबेडकर*

Satsang ka Sahi meaning
सत्संग हमे कूड़े का ट्रक नहीं बनने देगा…
(कूड़े का ट्रक) — प्रेरक कहानी !!!
एक दिन एक व्यक्ति ऑटो से रेलवे स्टेशन जा रहा था। ऑटो वाला बड़े आराम से ऑटो चला रहा था कि अचानक ही एक कार पार्किंग से निकलकर रोड़ पर आ गयी। ऑटो चालक ने तेजी से ब्रेक लगाया और कार, ऑटो से टकराते टकराते बची।
कार चालक गुस्से में ऑटो वाले को ही भला बुरा कहने लगा जबकि गलती कार- चालक की खुद की थी।
ऑटो चालक जो कि सत्संगी योगी था ने कार वाले की बातों पर गुस्सा नहीं किया और उल्टा मुस्कराते हुए आगे बढ़ गया।
ऑटो में बैठे व्यक्ति को कार वाले की हरकत पर गुस्सा आ रहा था और उसने ऑटो वाले से पूछा तुमने उस कार वाले को बिना कुछ कहे ऐसे ही क्यों जाने दिया। उसने तुम्हें भला बुरा कहा जबकि गलती तो उसकी थी। हमारी किस्मत अच्छी है, नहीं तो उसकी वजह से हम अभी अस्पताल में होते।
ऑटो वाले ने कहा साहब बहुत से लोग गार्बेज ट्रक (कूड़े का ट्रक) की तरह होते है। वे बहुत सारा कूड़ा अपने दिमाग में भरे हुए चलते है – हमेशा निराशा, क्रोध और चिंता से भरे हुए नकारात्मक रवैया अपनाते है। जब उनके दिमाग निराशा रूपी कूड़ा बहुत अधिक हो जाता है तो वे अपना बोझ हल्का करने के लिए इसे दूसरों पर फेंकने का मौका ढूँढ़ने लगते है।
इसलिए मैं ऐसे लोगों से दूरी बनाए रखता हूँ और उन्हें दूर से ही मुस्कराकर अलविदा कह देता हूँ क्योंकि अगर उन जैसे लोगों द्वारा गिराया हुआ कूड़ा अगर मैंने स्वीकार कर लिया तो मैं भी एक कूड़े का ट्रक बन जाऊँगा और अपने साथ साथ आसपास के लोगों पर भी निराशा रूपी कूड़ा गिराता रहूँगा।
हे सत्संगी लोगों, जिंदगी बहुत छोटी है जो हमसे अच्छा व्यवहार करते है उन्हें धन्यवाद कहो और जो हमसे अच्छा व्यवहार नहीं करते, उन्हें मुस्कुराकर माफ़ कर दो।