एक माचिस की तिल्लीएक घी का लोटालकड़ियों के ढेर पेकुछ घण्टे में राख.....बस इतनी-सी है आदमी की औकात।एक बूढ़ा बाप शाम को मर गयाअपनी सारी ज़िन्दगी परिवार के नाम कर गया।कहीं रोने की सुगबुगाहट हो रही थीतो कहीं फुसफुसाहट हो रही थी।....अरे जल्दी ले जाओ जलानेकौन रोयेगा सारी रात...बस इतनी-सी है आदमी की औकात।मरने के बाद नीचे देखानज़ारे नज़र आ रहे थे,मेरी मौत पे कुछ लोगज़बरदस्त रो रहे थेऔर कुछ लोग ज़बरदस्ती रो रहे थे।नहीं रहा..नहीं रहा चार दिन करेंगे बात...बस इतनी-सी है आदमी की औकात।बेटा अच्छी तस्वीर बनवायेगासामने अगरबत्ती जलायेगाखुश्बुदार फूलों की माला होगीअखबार में अश्रुपूरित श्रद्धान्जली होगी।..बाद में उस तस्वीर पे जाले भी कौन करेगा साफ़...बस इतनी-सी है आदमी की औकात।
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