शुक्रवार, 3 जून 2016

Is kavita ko sabhi groups me send karen please.....☝एक बार इस कविता को 💘दिल से पढ़िये😋शब्द शब्द में गहराई है...⛺जब आंख खुली तो अम्‍मा की⛺गोदी का एक सहारा था⛺उसका नन्‍हा सा आंचल मुझको⛺भूमण्‍डल से प्‍यारा था🌹उसके चेहरे की झलक देख🌹चेहरा फूलों सा खिलता था🌹उसके स्‍तन की एक बूंद से🌹मुझको जीवन मिलता था👄हाथों से बालों को नोंचा👄पैरों से खूब प्रहार किया👄फिर भी उस मां ने पुचकारा👄हमको जी भर के प्‍यार किया🌹मैं उसका राजा बेटा था🌹वो आंख का तारा कहती थी🌹मैं बनूं बुढापे में उसका🌹बस एक सहारा कहती थी🌂उंगली को पकड. चलाया था🌂पढने विद्यालय भेजा था🌂मेरी नादानी को भी निज🌂अन्‍तर में सदा सहेजा था🌹मेरे सारे प्रश्‍नों का वो🌹फौरन जवाब बन जाती थी🌹मेरी राहों के कांटे चुन🌹वो खुद गुलाब बन जाती थी👓मैं बडा हुआ तो कॉलेज से👓इक रोग प्‍यार का ले आया👓जिस दिल में मां की मूरत थी👓वो रामकली को दे आया🌹शादी की पति से बाप बना🌹अपने रिश्‍तों में झूल गया🌹अब करवाचौथ मनाता हूं🌹मां की ममता को भूल गया☝हम भूल गये उसकी ममता☝मेरे जीवन की थाती थी☝हम भूल गये अपना जीवन☝वो अमृत वाली छाती थी🌹हम भूल गये वो खुद भूखी🌹रह करके हमें खिलाती थी🌹हमको सूखा बिस्‍तर देकर🌹खुद गीले में सो जाती थी💻हम भूल गये उसने ही💻होठों को भाषा सिखलायी थी💻मेरी नीदों के लिए रात भर💻उसने लोरी गायी थी🌹हम भूल गये हर गलती पर🌹उसने डांटा समझाया था🌹बच जाउं बुरी नजर से🌹काला टीका सदा लगाया था🏯हम बडे हुए तो ममता वाले🏯सारे बन्‍धन तोड. आए🏯बंगले में कुत्‍ते पाल लिए🏯मां को वृद्धाश्रम छोड आए🌹उसके सपनों का महल गिरा कर🌹कंकर-कंकर बीन लिए🌹खुदग़र्जी में उसके सुहाग के🌹आभूषण तक छीन लिए👑हम मां को घर के बंटवारे की👑अभिलाषा तक ले आए👑उसको पावन मंदिर से👑गाली की भाषा तक ले आए🌹मां की ममता को देख मौत भी🌹आगे से हट जाती है🌹गर मां अपमानित होती🌹धरती की छाती फट जाती है💧घर को पूरा जीवन देकर💧बेचारी मां क्‍या पाती है💧रूखा सूखा खा लेती है💧पानी पीकर सो जाती है🌹जो मां जैसी देवी घर के🌹मंदिर में नहीं रख सकते हैं🌹वो लाखों पुण्‍य भले कर लें🌹इंसान नहीं बन सकते हैं✋मां जिसको भी जल दे दे✋वो पौधा संदल बन जाता है✋मां के चरणों को छूकर पानी✋गंगाजल बन जाता है🌹मां के आंचल ने युगों-युगों से🌹भगवानों को पाला है🌹मां के चरणों में जन्‍नत है🌹गिरिजाघर और शिवाला है🌹हर घर में मां की पूजा हो🌹ऐसा संकल्‍प उठाता हूं🌹मैं दुनियां की हर मां के🌹चरणों में ये शीश झुकाता हूं...     

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